Jammu Kashmir Adhyayan Kendra - Gujarat

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06/09/2025


जब लाहौर में शान से लहराया तिरंगा - 6 सितंबर, 1965

1965 भारत पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना लाहोर तक पहुंची

6 सितंबर, 1965 को भारत पाकिस्तान के बीच की वास्तविक सीमा रेखा इच्छोगिल नहर को पार करके भारतीय सेना पाकिस्तान में घुस गई। तेजी से आक्रमण करती हुई भारतीय थल सेना का कारवां बढ़ता रहा और भारतीय सेना लाहौर हवाई अड्डे के नजदीक पहुंच गई।

यहां एक रोचक वाकया हो गया। अमेरिका ने भारत से अपील की कि कुछ समय के लिए युद्धविराम किया जाए ताकि वो अपने नागरिकों को लाहौर से बाहर निकाल सके। भारतीय सेना ने अम‌ेरिका की बात मान ली और इस वजह से भारत को नुकसान भी हुआ। इसी युद्ध विराम के समय में पाकिस्तान ने भारत में खेमकरण पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया।

इस जंग में भारतीय सेना के करीब 3000 और पाकिस्तान के करीब 3800 जवान मारे गए। भारत ने युद्ध में पाकिस्तान के 710 वर्ग किलोमीटर इलाके और पाकिस्तान ने भारत के 210 वर्ग किलोमीटर इलाके को अपने कब्जे में ले लिया था। भारत ने पाकिस्तान के जिन इलाकों पर जीत हासिल की, ‌उनमें सियालकोट, लाहौर और कश्मीर के कुछ अति उपजाऊ क्षेत्र भी शामिल थे। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने भारत के छंब और सिंध जैसे रेतीले इलाकों पर कब्जा किया।

रूस के ताशकंद में भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब ख़ाँ के बीच 11 जनवरी, सन 1966 को समझौता हुआ। दोनों देश इस बात पर राजी हुए कि 5 अगस्त से पहले की स्थिति का पालन करेंगे और जीती हुई जमीन से कब्जा छोड़ देंगे।

ताशकंद समझौते कुछ ही घंटों बाद शास्त्री जी की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई। आधिकारिक तौर पर कहा गया कि ताशकंद की भयंकर सर्दी के चलते शास्त्री जी को दिल का दौरा पड़ा। जबकि, कुछ लोग ये भी दावा करते हैं कि एक षड्यंत्र के जरिए उनकी हत्या की गई। कुछ जानकार यह भी संभावना जताते हैं कि भारत पाक समझौते में कुछ मसलों पर आम राय कायम न होने के चलते शास्त्री जी तनाव में आ गए और उन्हें दिल का दौरा पड़ा।

26/06/2025


26 जून 1987 को करीब 21,000 फीट की ऊचांई पर मौजूद सियाचिन ग्लेशियर में मौजूद कायद चौकी को भारत ने पाकिस्तानी सेना से अपने कब्जे में ले लिया.

भारत के सामने इसको दोबारा से जीतने की बड़ी चुनौती थी. बाना सिंह ने इस मिशन के लिए अपने साथियों के साथ बातचीत की और एक खास योजना तैयार की. इस योजना के तहत उन्होंने अपने चार साथियों के साथ पाकिस्तानी घुसपैठियों तक पहुंचने के लिए एक बेहद ही खतरनाक रास्ते को चुना. दूसरी तरफ चढ़ाई के दौरान दूसरी यूनिट द्वारा विरोधियों को उलझा कर रखने को कहा. आइडिया काम कर रहा था.

बाना अपने साथियों के साथ तेजी से आगे बढ़ रहे थे. तभी उनकी नज़र कायद पोस्ट पर पड़ी, जो बर्फ की दीवार से पटी हुई थी. अब बाना के सामने चुनौती थी कि वह इस बर्फ की दीवार को कैसे पार करें. तापमान लगातार गिरता जा रहा था. दूसरी तरफ अंधेरा हो रहा था. कुछ देर रुकने के बाद बाना ने तय किया कि वह रात के अंधेरे का फायदा उठाएंगे और चढ़ाई करेंगे.

जल्द वह पोस्ट के नज़दीक पहुंचने में सफल रहे. इसके बाद उन्होंने अपनी साथियों को दो टीमों में बांट दिया और अलग-अलग दिशा से विरोधियों पर ग्रेनेड फेंकने को कहा. यह सब इतनी जल्दी में हुआ कि पाकिस्तानी सेना को समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ.

देखते ही देखते ही विरोधियों की लाशें बिछ गई. विरोधी जब कम संख्या में बचे तो वह पोस्ट छोड़कर भाग गए. इस तरह बाना सिंह अपने साथियों राइफलमैन चुन्नी लाल, लक्ष्मण दास, ओम राज और कश्मीर चंद की मदद से कायद चौकी पर अंतत: भारतीय झण्डा फहराने में सफल रहे.

अद्मय साहस और नेतृत्व के लिए नायब सूबेदार बाना सिंह को बाद में सेना के सबसे बड़े सम्मान परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया. यही नहीं उनके सम्मान में कायद चौकी का नाम 'बाना टॉप' कर दिया गया था. इस जंग के बाद 2000 तक बाना सिंह ने भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दी.

26/04/2025

जम्मू और कश्मीर रियासत के अंतिम शासक महाराज हरि सिंह निधन 26 अप्रैल 1961 को हुआ था. वे महाराज रणबीर सिंह के पुत्र और पूर्व महाराज प्रताप सिंह के भाई, राजा अमर सिंह के सबसे छोटे पुत्र थे। इन्हें जम्मू-कश्मीर की राजगद्दी अपने चाचा, महाराज प्रताप सिंह से वीरासत में मिली थी।

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