भारत का ईतिहास

भारत का ईतिहास

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भारत का गौरवशाली इतिहास

04/07/2025

🕉️ शेषनाग और पृथ्वी का वैदिक विज्ञान समझो! 🌍🐍

क्या आपको पता है कि "शेषनाग पर टिकी पृथ्वी" कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि गूढ़ वैदिक विज्ञान का संकेत है?

🔬 शेषनाग का वैज्ञानिक अर्थ:

"शेष" = अंतरिक्ष

"नाग" = गुरुत्वाकर्षण + चुंबकीय बल
👉 यानी हमारी पृथ्वी अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय शक्तियों के संतुलन पर स्थिर है — न गोल है, न चपटी।

💡 यह वही सत्य है, जिसे आज का विज्ञान ग्रेविटी और मैग्नेटिक फील्ड कहता है, लेकिन हमारे ऋषियों ने इसे शेषनाग के प्रतीक से हज़ारों साल पहले समझाया था।

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📚 प्राचीन ऋषियों की विज्ञान में महान उपलब्धियाँ:

🪐 आर्यभट्ट

पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष पर घूमती है (5वीं शताब्दी)

सूर्यकेंद्रित सौरमंडल का सिद्धांत (कोपरनिकस से 1000 साल पहले)

🌌 भास्कराचार्य

गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (न्यूटन से 500 वर्ष पहले)

🧮 ब्रह्मगुप्त

शून्य और दशमलव प्रणाली की खोज (7वीं शताब्दी)

आज के कंप्यूटर इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित हैं

✈️ ऋषि भरद्वाज

विमानशास्त्र में उड़ने वाले यानों का वर्णन — "शकुना", "रोहिणी", आधुनिक विमानों से पहले

🔬 ऋषि कणाद

परमाणु सिद्धांत — एटम की खोज, जिसे पाश्चात्य दुनिया ने हज़ारों साल बाद समझा

🧑‍⚕️ सुश्रुत

प्लास्टिक सर्जरी, नेत्र चिकित्सा, 121 शल्य उपकरण — 2500 वर्ष पहले!

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🚩 क्यों ज़रूरी है वैदिक ज्ञान को समझना?

जो अपने ग्रंथों को नहीं पढ़ते और सिर्फ़ मज़ाक उड़ाते हैं, वे अपने गौरवशाली विज्ञान और दर्शन से दूर हो जाते हैं।
हमारे ग्रंथ केवल "आस्था" नहीं, गहन विज्ञान से भरे हुए हैं — ज़रूरत है सिर्फ़ सही समझ और गर्व की।

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✨ आइए, फिर से जुड़ें अपने वैदिक विज्ञान से।
📖 ग्रंथों को समझें, ज्ञान को अपनाएं, और गर्व से कहें:

🕉️ जय भारत!
🚩 जय वैदिक विज्ञान!

24/05/2025

मित्रों आइए जानते हैं प्राचीन द्वीप के लोक-नाम और वर्तमान द्वीप के लोक-नामों को

प्राचीन द्वीप नाम वर्तमान द्वीप नाम

(1) जम्बू द्वीप एशिया
(2) पलक्ष द्वीप योरोप
(3) सालमली द्वीप उ०म० अमेरिका
(४) कुश द्वीप अफ्रीका
(5) कौच द्वीप ऑस्ट्रेलिया
(6) शाक द्वीप दक्षिण अमेरिका
(7) पुष्कर द्वीप ग्रीन लैंड

प्राचीन सागर नाम वर्तमान सागर नाम

(1) क्षीर सागर प्रशांन्त महासागर
(2) क्षीरोद सागर कैस्पियन सागर
(3) यतोद सागर आर्कटिक सागर
(4) उदधि सागर हिन्द महासागर
(5) इक्षु सागर अटलांटिक सागर
(6) सरोद सागर भूमध्य सागर
(7) दयोद सागर एन्टार्कटिक सागर

आदि काल में जहाँ सबसे पहले मनुष्य-जाति उत्त्पन्न हुई उसको विविष्टय या तिब्बत कहते हैं। यह संसार में सबसे ऊँचा स्थान है। यहाँ पर मनुष्य-जाति आर्य कहलाई और वहां से चलकर उत्तरी भारत में उसने सब से पहले ब्रह्मवर्त यानि ऋषि देश बसाया। उसके पश्च्यात वह हिमालय व समुद्र के बिच समस्त स्थान में फ़ैल गई और इस स्थान का नाम आर्यावर्त कहलाया। इसी को वर्तमान में भारतवर्ष कहते हैं। यहीं से आर्य चारो ओर दूर-दूर देशो में फैले। समस्त भू-मण्डल में जितनी भी जातियां हैं वह सब इन्ही आर्यों की संतान हैं। जल, वायु और भौगोलिक कारणों से लोगों के रहन-सहन, बोल-चाल, आचार-विचार व शारीरिक बनावट व रंग-रूप में अंतर पड़ गया है। भिन्न-भिन्न देशों में पृथ्वी की खुदाई से जो अवशेष मिल रहे हैं उनसे प्रकट होता है कि समस्त विश्व में आर्य यानी भारतीय संस्कृति ही भूतकाल में फैली हुई थी । शास्त्रों व पुराणों में जिन लोकों व सागरों का वर्णन आया है वर्तमान में वह उपरोक्त नामो से पुकारे जाते है।

26/07/2024

#घोड़खिंड की लड़ाई!

अधिकांश लोगों ने संभवतः यह नाम ही नहीं सुना होगा! कक्षा दसवीं तक पढ़ाए जाने वाले इतिहास में इस लड़ाई को स्थान नहीं दिया गया है। परन्तु, 350 वर्षों से भी पूर्व लड़ी गई इस #लड़ाई ने एक तरह से #भारत का भविष्य बदल कर रख दिया। फिर भी इसे बच्चों को पढ़ाया नहीं जाता क्योंकि शायद #भारतीय #विजयगाथाओ को पढ़ने लायक #इतिहास माना ही नहीं गया।

शिवाजी महाराज द्वारा अफ़ज़ल ख़ान को मौत के घाट उतार देना एक #अकल्पनीय घटना थी। अफ़ज़ल के सुल्तान #बीजापुर के आदिलशाह के लिए यह एक गहरा आघात था। #शिवाजी_महाराज भी इस विजय के प्रभाव को समझते थे। उन्होंने #अफ़ज़ल के वध से उत्पन्न परिस्थिति का लाभ उठाते हुए बीजापुर की सीमाओं में अपने हमले तेज कर दिए। मात्र अठारह दिनों के अन्दर ही महाराज ने कोल्हापुर के नजदीक पन्हाला के किले को अपने अधिपत्य में ले लिया। पन्हाला एक प्रमुख किला था और शिवाजी का उसे जीत लेना आदिलशाह के लिए एक और आघात था। परेशान आदिलशाह ने अफ़ज़ल के पुत्र फ़ज़ल और रुस्तम जुमा के नेतृत्व में एक बड़ी सेना शिवाजी के बंदोबस्त के लिए भेजी परन्तु शिवाजी महाराज ने उन्हे कोल्हापुर के नजदीक बुरी तरह पराजित कर दिया।

अब आदिलशाह क्रोधित नहीं बल्कि डरा हुआ था। शिवाजी महाराज का पराक्रम बढ़ता जा रहा था। अंततः आदिलशाह की ओर से सिद्धि जौहर 60000 की विशाल सेना लेकर पन्हाला पहुंचा। शिवाजी महाराज पन्हाला गढ़ पर ही थे। सिद्धि ने नीचे तलहटी में गढ़ को चारों ओर से घेर लिया। सिद्धि कुशल सेना नायक था। उसने गढ़ के चारों ओर घेरा इतना सुदृढ़ बनाया था कि उसे भेद कर निकलना असंभव था। शिवाजी महाराज करीब चार महीनों तक पन्हाला पर ही अटके हुए थे। इसी बीच बारिश का मौसम भी शुरू हो चुका था।

गढ़ के ऊपर शिवाजी महाराज के पास बहुत सीमित सेना थी। धीरे धीरे रसद और असलहा भी समाप्त हो रहा था। स्थिति प्रत्येक गुजरते दिन के साथ गंभीर होती जा रही थी। सिद्धि का घेरा कमजोर पड़ ही नहीं रहा था। स्पष्ट था कि यदि कुछ दिन और ऐसा ही चलता रहा तो शिवाजी महाराज को या तो समर्पण करना होगा या युद्ध में #वीरगति को प्राप्त हो जाना होगा।

इस करो या मरो की स्थिति में शिवाजी महाराज और उनके विश्वासपात्र सैनिकों ने एक योजना बनाई। तय हुआ कि शिवाजी का हमशक्ल, उनका नाई, शिवा काशिद, को शिवाजी महाराज के कपड़े इत्यादि पहना कर राजसी पालकी में बैठा कर ऐसे रास्ते से किले के बाहर ले जाया जाएगा जहां उसका पकड़ में आना तय था। ऐसा होते ही सिद्धि की छावनी में यह ख़बर फैल जाएगी कि शिवा पकड़ा गया! शिवा काशिद जब तक हो सके यह भ्रम बनाए रखेगा कि वह ही असली शिवाजी है। उधर दूसरी ओर असली शिवाजी महाराज साढ़े कपड़ों में एक अन्य पालकी में ऐसे स्थान से पन्हाला के बाहर निकलेंगे जहां सिद्धि का घेरा थोड़ा कमजोर था। घेरे से बाहर निकल कर शिवाजी विशाल गढ़ चले जायेंगे जो पन्हाला से बीस कोस याने लगभग 70 किमी दूर था।

सन 1660 में गुरुपूर्णिमा की रात्रि में शिवा काशिद शिवाजी महाराज बनकर एक पालकी में बैठकर पन्हाला से निकल पड़ा। उसे यह अच्छी तरह पता था कि असलियत खुलते ही उसकी मौत निश्चित थी। परन्तु महाराज की प्राण रक्षा के लिए उसने यह #बलिदान सहर्ष स्वीकार किया था। जो होना था वही हुआ। शिवा शीघ्र ही पकड़ा गया। पूरी छावनी में खबर आग की तरह फैल गई, “शिवा पकड़ा गया”। परन्तु कुछ ही देर में शत्रु समझ गया कि यह नकली शिवाजी है। उधर महाराज जिस जगह से घेरा तोड़ने में सफल हुए वहां से भी खबर आ गई कि शिवा भाग चुका है। तुरन्त ही शत्रु के करीब 2000 से अधिक घुड़सवार सैनिक असली शिवाजी और उनके 600 सैनिकों के पीछे दौड़ पड़े। शिवाजी महाराज पालकी में थे। अन्य सैनिक और अधिकारी पैदल ही चल रहे थे। पूर्णमासी की उस रात धुआंधार वर्षा भी हो रही थी। घटाटोप अंधेरा, घना जंगल और कीचड़। कहार तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। शिवाजी के साथ बाजीप्रभु देशपांडे नामक #सेनानायक अपने 600 वीरों के साथ चल रहा था। सुबह होते होते मराठे घोड़खिंड़ के नजदीक पहुंचे। घोढ़खिंड दो चट्टानी दीवारों के मध्य एक संकरा गलियारा था। दिन के उजाले में अब पीछा करता शत्रु नजर आने लगा था।

बाजीप्रभू ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए शिवाजी महाराज को निवेदन किया कि बेहतर होगा कि महाराज आधे सैनिकों के साथ पैदल विशालगढ़ की और बढ़ जाए। वहां भी शत्रु का घेरा था परन्तु सिद्धि के घेरे जितना सुदृढ़ नहीं था। शिवाजी महाराज और उनके सैनिक उस घेरे को तोड़ विशाल गढ़ पहुंच जायेंगे। इधर बाजीप्रभु देशपांडे अपने सैनिकों के साथ सिद्धि के सैनिकों को घोढ़खिंड की भौगोलिक स्थिति का लाभ ले कर रोक कर रखेंगे। जब महाराज विशालगढ़ पहुंच जाएं तब गढ़ की तोप से इशारे का एक प्रहार कराएं जिससे बाजीप्रभु समझ जायेंगे कि महाराज सकुशल विशालगढ़ पहुंच चुके है। यह प्रसंग शिवाजी महाराज के लिए अत्यन्त कठिन और असहनीय था। बाजीप्रभू और उनके सैनिकों को छोड़ कर जाने का सीधा मतलब था उन्हे मौत के हवाले कर जाना। 2000 सैनिकों के सामने आखिर 300 सैनिक कहां तक टिकते? परन्तु बाजीप्रभु अड़ गए। उन्होंने शिवाजी महाराज को मजबूर किया कि वें 300 सैनिकों के साथ पैदल ही विशालगढ़ की ओर बढ़ जाएं। ऐसा ही हुआ।

अब बाजीप्रभु और उनके कुछ बहादुर सैनिक घोढ़खिंड के गलियारे के छोर पर शत्रु के सैनिकों से भिड़ गए। 2000 के सामने 300! गलियारे का लाभ उठाते हुए मराठों ने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया और सिद्धि के सैनिकों को रोक लिया। कत्लेआम मचा हुआ था। आमने सामने की लड़ाई चल रही थी। बाजीप्रभू ने पराक्रम की पराकाष्ठा दिखा दी। दोनों हाथों में तलवारें लिए यह भीमकाय योद्धा शत्रु सैनिकों को गाजर मूली की तरह काट रहा था। बाजी और उनके सैनिक सिद्धि के सैनिकों पर यमदूत की भांति टूट पड़े थे। मात्र 150 कदम के घोढ़खिंड गलियारे को सिद्धि के सैनिक पार नहीं कर पा रहे थे। मराठे सैनिक बगैर विश्राम या अन्न भोजन के रात भर से दौड़ रहे थे। अब सुबह से वे घोड़खिंड के मुहाने पर चट्टान की भांति अड़े हुए थे।

उधर शिवाजी महाराज पैदल अपने सैनिकों के साथ विशालगढ़ की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में आदिलशाह के सरदार सुर्वे का घेरा था। शिवाजी और उनके सैनिक भी रात भर से बिना अन्न भोजन के चल दौड़ रहे थे। परन्तु विशालगढ़ नजर आने लगा था। सभी के शरीर में नई ऊर्जा का संचार हो कर वे शत्रु सैनिकों पर टूट पड़े। कुछ ही देर में उन्होंने घेरे को तोड़ विशालगढ़ चढ़ना शुरू कर दिया था।

इधर घोड़खिंड़ में खून को होली चल रही थी। बंदूक का एक प्रहार सीने पर आ लगने से बाजीप्रभु मूर्छित हो कर गिर गए। तुरन्त ही होश में आए। होश में आते ही पूछा कि महाराज के पहुंचने की तोप की आवाज आई क्या? साथ के सैनिकों के कहा कि अभी तक नही आई है! कहते हैं, कि बुरी तरह घायल बाजी यह सुनते ही पुनः उठ खड़े हुए और यह कहते हुए शत्रु सैनिकों पर टूट पड़े कि यदि महाराज पहुंचे नहीं तो बाजी मरेगा कैसे? कुछ ही देर बाद, महाराज दौड़ते हुए विशालगढ़ पहुंचे। उन्होंने गढ़ की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते ही आदेश दिया कि तोप से धमाका किया जाय। आदेश का तुरन्त पालन हुआ। नीचे लड़ते हुए बाजीप्रभु देशपांडे ने तोप के धमाके की आवाज सुनी और उनके चेहरे पर संतोष की मुस्कान छा गई। शिवाजी महाराज सकुशल विशालगढ़ पहुंच चुके थे। सिद्धि का हमला असफल सिद्ध हो चुका था। बीजापुर के आदिलशाह को एक और जबरदस्त आघात पहुंचा था। अब बाजीप्रभु मर सकता था।

300 मराठे खेत रहे। परन्तु उन्होंने कुछ बेशकीमती घण्टों तक सिद्धि जौहर की सेना को घोड़खिंड तक रोक रखा था। शिवाजी महाराज जीवित सिद्धि के घेरे से निकल गए थे। अगले बीस वर्षों में शिवाजी महाराज ने हिंदवी साम्राज्य की नींव तो रखी ही, योद्धाओं की एक ऐसी संस्कृति विकसित की जिसने आने वाले दशकों में छत्रपति संभाजी, ताराबाई, संताजी घोरपड़े, धनाजी जाधव और बाजीराव पेशवा जैसे अनमोल रणवीर उत्पन्न किए, जिन्होंने अगले 120 से भी अधिक वर्षों तक भारत के विशाल भाग पर राज्य किया और सनातन के क्षरण को रोक हिन्दू संस्कृति का ध्वज लहराया।

मराठों का अगले 120 वर्षों का गौरवशाली इतिहास शायद लिखा ही नहीं जाता यदि 13 जुलाई 1660 की उस गुरुपूर्णिमा को शिवा काशिद, बाजीप्रभु देशपांडे और उनके सैनिक अपने प्राण न्योछावर कर शिवाजी महाराज के प्राण नहीं बचाते! महाराज ने मराठों के रक्त से पावन हुए इस गलियारे का नाम बदल कर पावनखिंड कर दिया।

आज 13 जुलाई को आज के ही दिन सन 1660 में सर्वोच्च बलिदान देने वाले शिवा काशिद, अतुलनीय पराक्रमी बाजीप्रभु देशपांडे और उनके 300 जांबाज सैनिकों और कहारों को सादर प्रणाम। उन्होंने सिर्फ शिवाजी को ही नहीं अपितु समस्त सनातन समाज को ही नजीवन प्रदान किया यह असंदिग्ध है।

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03/06/2024

ऊँठाला युद्ध का रोचक वर्णन :- मुगल सिपहसालार कायम खां ऊँठाळे दुर्ग में तैनात था। इस युद्ध को मेवाड़ के इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है। इसका सबसे अहम कारण था चुण्डावतों व शक्तावतों में हरावल में रहने की होड़।

मेवाड़ की हरावल अर्थात सेना की अग्रिम पंक्ति में रहकर लड़ने का अधिकार चुण्डावतों को प्राप्त था। जब महाराणा अमरसिंह ने ऊँठाळे दुर्ग पर आक्रमण करने की बात दरबार में की, तब वहां मौजूद महाराज शक्तिसिंह के पुत्र बल्लू सिंह शक्तावत ने महाराणा से अर्ज किया कि

"हुकम, मेवाड़ की हरावल में रहने का अधिकार केवल चुंडावतों को ही क्यों है, क्या हम शक्तावत किसी मामले में पीछे हैं ?"

तभी दरबार में मौजूद रावत कृष्णदास चुंडावत के पुत्र रावत जैतसिंह चुंडावत ने कहा कि "मेवाड़ की हरावल में रहकर लड़ने का अधिकार चुंडावतों के पास पीढ़ियों से है।"

महाराणा अमरसिंह के सामने दुविधा खड़ी हो गई, क्योंकि वे दोनों को ही नाराज नहीं कर सकते थे। सोच विचारकर महाराणा अमरसिंह ने इस समस्या का एक हल निकाला।

महाराणा अमरसिंह ने कहा कि "आप दोनों शक्तावतों और चुंडावतों की एक-एक सैनिक टुकड़ी का नेतृत्व करो और अलग-अलग रास्तों से ऊँठाळे दुर्ग में जाने का प्रयास करो। दोनों में से जो भी ऊँठाळे दुर्ग में सबसे पहले प्रवेश करेगा, वही हरावल में रहने का अधिकारी होगा"

महाराणा अमरसिंह ने खुद इस महायुद्ध का नेतृत्व किया। महाराणा के नेतृत्व में 10,000 मेवाड़ी वीरों ने ऊँठाळे गांव में प्रवेश किया, जहां मुगलों से लड़ाई हुई।

इस लड़ाई में सैंकड़ों मुगल मारे गए। मुगल सेना ने भागकर ऊँठाळे दुर्ग में प्रवेश किया। मेवाड़ी सेना ने ऊँठाळे दुर्ग को घेर लिया।

दुर्ग में प्रवेश करने के लिए बल्लू जी शक्तावत दुर्ग के द्वार के सामने आए और अपने हाथी को आदेश दिया कि द्वार को टक्कर मारे पर लोहे की कीलें होने से हाथी ने द्वार को टक्कर नहीं मारी। ऊपर से हाथी मकुना अर्थात बिना दांत वाला था।

बल्लू जी द्वार की कीलों को पकड़ कर खड़े हो गए और महावत से कहा कि हाथी को मेरे शरीर पर हूल दे। हाथी ने बल्लू जी के टक्कर मारी, जिससे बल्लू जी नुकीली कीलों से टकराकर वीरगति को प्राप्त हुए। द्वार टूट गया और द्वार के साथ-साथ बल्लू जी भी किले के भीतर गिर पड़े। बल्लू जी के इस बलिदान के बावजूद वे हरावल का अधिकार नहीं ले सके।

रावत जैतसिंह चुण्डावत सीढियों के सहारे ऊपर चढ रहे थे। ऊपर पहुंचते ही मुगलों की बन्दूक से निकली एक गोली रावत जैतसिंह की छाती में लगी, जिससे वे सीढ़ी से गिरने लगे, तभी उन्होंने अपने साथियों से कहा कि मेरा सिर काटकर दुर्ग के अन्दर फेंक दो। साथियों ने ठीक वैसा ही किया।

इस तरह किले में पहले प्रवेश करने के कारण हरावल का नेतृत्व चुण्डावतों के अधिकार में ही रहा।

महाराणा अमरसिंह ने अपने हाथों से कायम खां को मारा और मेवाड़ी वीरों ने ऊँठाळे दुर्ग पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। इस युद्ध में कई मुगल मारे गए व महाराणा अमरसिंह ने बचे खुचे मुगलों को कैद किया।

पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत

28/05/2024

अस्पृश्यता हमारे देश और समाज के माथे पर एक कलंक है। इस घातक बुराई को हमें त्यागना होगा।

26/05/2024

#नारद_जयंती #देवर्षि_नारद_जयंती
सृष्टि के प्रथम संदेशवाहक, पत्रकारिता के सर्वोत्तम आदर्श, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, आदि पत्रकार देवर्षि नारद जी की जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं

27/02/2024

चार भुजाओ वाले योद्धा :– जयमल और कल्ला जी राठौर

कल्ला जी राठौड़ वे शूरवीर थे, जिन्होंने चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण के समय महाराणा उदयसिंह की सेना में शामिल होकर अपनी वीरता का परिचय दिया था। युद्ध में सेनापति जयमल सिंह राठौड़ थे। उनके पांव घायल हुए तो 24 साल के कल्ला जी ने उन्हें कंधों पर बिठाकर चार भुजाओं के साथ युद्ध किया। दो भुजाएं कल्ला जी की और दो जयमल की जिसे देख कर उन्हे चतुर्भुज देवता की संज्ञा मिली उन्हे देख कर अकबर को लगा मानो युद्धभूमि में चार भुजाओं बाला कोई देवता युद्ध कर रहा हो , माना जाता हे उनके सर कट जाने के बाद भी उनके धड़ युद्धभूमि में लड़ते रहे 🗡️

21/02/2024

गागरोन के युद्ध में महियारिया गोत्र के चारण हरिदास ने जंग के मैदान में घोड़े से गिरे हुए महमूद खिलजी को पकड़ लिया और महाराणा सांगा के सामने पेश किया। महाराणा सांगा महमूद खिलजी को कैद कर चित्तौड़ ले आए।

महाराणा सांगा ने खुश होकर चित्तौड़ का राज हरिदास जी को सौंपना चाहा, पर हरिदास जी ने लेने से मना किया व सिर्फ 12 गाँव लेकर ही सन्तुष्ट हुए। इन 12 गांव में से पांचली गांव में अब तक हरिदास जी के वंशज मौजूद हैं।

14/01/2024

अयोध्या में निर्माणाधीन श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की विशेषताएं:

1. मंदिर परम्परागत नागर शैली में बनाया जा रहा है।

2. मंदिर की लंबाई (पूर्व से पश्चिम) 380 फीट, चौड़ाई 250 फीट तथा ऊंचाई 161 फीट रहेगी।

3. मंदिर तीन मंजिला रहेगा। प्रत्येक मंजिल की ऊंचाई 20 फीट रहेगी। मंदिर में कुल 392 खंभे व 44 द्वार होंगे।

4. मुख्य गर्भगृह में प्रभु श्रीराम का बालरूप (श्रीरामलला सरकार का विग्रह), तथा प्रथम तल पर श्रीराम दरबार होगा।

5. मंदिर में 5 मंडप होंगे: नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना मंडप व कीर्तन मंडप

6. खंभों व दीवारों में देवी देवता तथा देवांगनाओं की मूर्तियां उकेरी जा रही हैं।

7. मंदिर में प्रवेश पूर्व दिशा से, 32 सीढ़ियां चढ़कर सिंहद्वार से होगा।

8. दिव्यांगजन एवं वृद्धों के लिए मंदिर में रैम्प व लिफ्ट की व्यवस्था रहेगी।

9. मंदिर के चारों ओर चारों ओर आयताकार परकोटा रहेगा। चारों दिशाओं में इसकी कुल लंबाई 732 मीटर तथा चौड़ाई 14 फीट होगी।

10. परकोटा के चारों कोनों पर सूर्यदेव, मां भगवती, गणपति व भगवान शिव को समर्पित चार मंदिरों का निर्माण होगा। उत्तरी भुजा में मां अन्नपूर्णा, व दक्षिणी भुजा में हनुमान जी का मंदिर रहेगा।

11. मंदिर के समीप पौराणिक काल का सीताकूप विद्यमान रहेगा।

12. मंदिर परिसर में प्रस्तावित अन्य मंदिर- महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, निषादराज, माता शबरी व ऋषिपत्नी देवी अहिल्या को समर्पित होंगे।

13. दक्षिण पश्चिमी भाग में नवरत्न कुबेर टीला पर भगवान शिव के प्राचीन मंदिर का जीर्णो‌द्धार किया गया है एवं तथा वहां जटायु प्रतिमा की स्थापना की गई है।

14. मंदिर में लोहे का प्रयोग नहीं होगा। धरती के ऊपर बिलकुल भी कंक्रीट नहीं है।

15. मंदिर के नीचे 14 मीटर मोटी रोलर कॉम्पेक्टेड कंक्रीट (RCC) बिछाई गई है। इसे कृत्रिम चट्टान का रूप दिया गया है।

16. मंदिर को धरती की नमी से बचाने के लिए 21 फीट ऊंची प्लिंथ ग्रेनाइट से बनाई गई है।

17. मंदिर परिसर में स्वतंत्र रूप से सीवर ट्रीटमेंट प्लांट, वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट, अग्निशमन के लिए जल व्यवस्था तथा स्वतंत्र पॉवर स्टेशन का निर्माण किया गया है, ताकि बाहरी संसाधनों पर न्यूनतम निर्भरता रहे।

18. 25 हजार क्षमता वाले एक दर्शनार्थी सुविधा केंद्र (Pilgrims Facility Centre) का निर्माण किया जा रहा है, जहां दर्शनार्थियों का सामान रखने के लिए लॉकर व चिकित्सा की सुविधा रहेगी।

19. मंदिर परिसर में स्नानागार, शौचालय, वॉश बेसिन, ओपन टैप्स आदि की सुविधा भी रहेगी।

20. मंदिर का निर्माण पूर्णतया भारतीय परम्परानुसार व स्वदेशी तकनीक से किया जा रहा है। पर्यावरण-जल संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कुल 70 एकड़ क्षेत्र में 70% क्षेत्र सदा हरित रहेगा।

01/12/2023

👉माण्डलगढ के राव बल्लु दादा सौलंकी।

मांडलगढ़ के बल्लू दादा सौलंकी ने अकेले ही अकबर के दो खास ख्वाजा अब्दुलमाजिद और असरफ खान की सेना का डट कर मुकाबला किया और मौत के घाट उतार दिया | हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के साथ युद्ध में काम आये | बल्लू दादा के बाद उनके पुत्र नंदराय सोलंकी ने मांडलगढ़ – मेवाड की कमान अपने हाथों में ली इन्होने मांडलगढ़ की बहुत अच्छी तरह देखभाल की लेकिन इनके समय महाराणा प्रताप जंगलो में भटक रहे थे, तब अकबर ने मान सिंह के साथ मिलकर मांडलगढ़ पर हमला कर दिया और सभी सोलंकियों ने उनका डट कर मुकाबला किया और लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की |

11/10/2023

#श्री_कृष्ण_यदुवंशी_क्षत्रिय_थे
और जानते है अहीर,गोप, ग्वाला, अहर ,कमरिया, घोसी यादव कैसे बने

आज हम आपको सच्चे #यदुवंशी_क्षत्रिय_राजपूतो और आजकल छदम यादव उपनाम लिखने वालो के बारे में #सटीक_जानकारी देंगे।
जब जब धर्म की हानि होती है अधर्म का जोर बढ़ता है तो भगवान नारायण क्षत्रिय वर्ण में अवतार लेकर आतताइयों का संहार करते हैं.क्षत्रियों में सुर्यवंश की रघुवंश शाखा में भगवान श्री राम के रूप में और चन्द्रवंश की यदुवंशी शाखा में योगिराज श्री कृष्ण के रूप में नारायण ने अवतार लिया..........
श्रीकृष्ण अवतार पूर्ण अवतार माना जाता है.श्री कृष्ण ने कंस जैसे अत्याचारी का वध किया और महाभारत के युद्ध में पांड्वो का पक्ष लेकर धर्मयुद्ध में सहायक बने.
श्री कृष्ण के जीवनकाल में ही गांधारी के श्राप से यदुवंश में गृह युद्ध हुआ जिससे यदुवंश का विनाश हो गया.....
श्रीकृष्ण का बाल्यकाल में लालन पालन नन्दबाबा के यहाँ हुआ था,नन्दबाबा गोकुल में अहीरो से कर वसूलने का कार्य करते थे,जबकि श्री कृष्ण यदुवंशी क्षत्रिय थे.....
पर पिछले सौ सालो से सभी अहीरों ने भगवान् श्री कृष्ण से जोड़कर खुद को यादव लिखना शुरू कर दिया है.....पर ये एक ऐसा झूठ है जिसने सच का रूप धारण कर लिया है,
((जबकि महाभारत के मुसल पर्व में साफ़ लिखा है कि जब अर्जुन बचे हुए यदुवंशी स्त्री बच्चो को द्वारिका से वापस लेकर आ रहे थे तो मार्ग में उन्हें अभिरो अहीरों ने लूट लिया था।
तभी कहा गया कि
" समय होत बलवान,अभीरन लूटी गोपिका वही अर्जुन ,वही बाण!"।))
जिन्होंने यदुवंशी स्त्रियों बच्चो को असहाय स्थिति में लूट लिया था विडम्बना देखिये आज वही अहीर यादव उपनाम लिखने लगे और असली यदुवंशी राजपूतो ने भाटी ,जादौन,जडेजा आदि नये उपनाम धारण कर लिए।
((19 वी सदी तक भी अहीर खुद को यादव नही मानते थे।))

रेवाड़ी के यदुवंशी अहीर खुद को राजपूत ही मानते थे जो पितृ पक्ष की और से यदुवंशी राजपूत थे। पर लगभग ((सन1920 में अहिरो की सभा हुई जिसके बाद ग्वाल ,गोप,अहर,घोसी,कमरिया अहिरो ने अचानक से यादव उपनाम लिखना शुरू कर दिया।
जबकि गुजरात,महाराष्ट्र के अहीर आज भी खुद को यादव नही लिखते हैं।))

#शुद्ध_रक्त_के_यदुवंशी_क्षत्रिय_सिर्फ_राजपूतो_और_मराठो_में_जादौन_भाटी_जडेजा_चुडासमा_जाधव_छोकर_सलारिया

#हैहय_कलचुरी_सरवैया_आदि_वंशो_में_मिलते_हैं,
इन सब यदुवंशी क्षत्रिय शाखाओ और उनकी रियासतों की पूरी डिटेल हम अलग से दंगे।

((श्री कृष्ण जी का छत्र जो आज भी जैसलमेर मे श्री कृष्ण जी वंशज भाटी वंश के राजपूत परिवार पर सुरक्षित रखा हुआ है
जो इस बात का सबसे पुख्ता सबूत है कि श्री कृष्ण जी के असली वंशज भाटी है ना कि वो लोग जो तथ्यहीन बाते और लोगो को बरगलाने के स्वघोषित श्री कृष्ण जी के वंशज खुद को बताकर राग अलाप रहे है --!!
हाल ही में गुजरात में न्यायालय द्वारा जाडेजा राजपूतों को श्रीकृष्ण का वंशज होने की मान्यता दी गयी है।))

अन्य समाज में यदुवंश या तो राजपूत पुरुषों के उन वर्गों की महिलाओ से अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न हुआ है अथवा उन्होंने छदम यदुवंशी का रूप धारण कर लिया है......
कुछ यदुवंशी अंतरजातीय विवाह के कारण जाटों में भी मिल गये हैं,जैसे

#भरतपुर_का_राजवंश--

करौली के जादौन राजपूत बालचंद्र नेे सोरोत गोत्र की जाट कन्या का डोला लूटकर उससे विवाह कर लिया।उसकी संतान जाटों में मिल गयी और उससे उनमे सिनसिनवार वंश चला और भरतपुर की गद्दी की स्थापना की।
((पटियाला,नाभा,जीन्द फरीदकोट की जट्ट सिख रियासते--

#जैसलमेर के भाटी राजपूत पंजाब 12 वी सदी में पंजाब आये। इनमे से फूल सिंह ने जाट लडकी से शादी की जिनकी सन्तान आज सिद्धू,बराड आदि जट्ट सिख हैं इन्होने वहां पटियाला,नाभा,जीन्द,फरीदकोट आदि रियासत स्थापित की जो आज फूल्किया कहलाती हैं।जो शुद्ध रहे उन्होंने हिमाचल की सिरमौर रियासत स्थापित की।))

((एनसीआर के भाटी गुज्जर----
जैसलमेर के रावल कासव और रावल मारव बुलंदशहर आये इन्होने यहाँ धूम मानिकपुर रियासत की स्थापना की जिसमे 360 गाँव थे। पर बाद में यहाँ के बहुत से भाटी राजपूत समीपवर्ती गूजरो से शादी विवाह करके गूजरो में शामिल हो गये और आज भाटी गूजर कहलाते हैं।इस इलाके में और समीपवर्ती पलवल में आज भी भाटी राजपूत पाए जाते हैं।))

(( #शेरे_पंजाब_महाराजा_रणजीत_सिंह----
स्वयं पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह जिनके पूर्वज सांसी जाति के थे और बाद में शक्तिशाली होने के कारण इस वंश के साथ दुसरे सिख जाट मिसलदारो ने शादी विवाह किये जिससे यह सांसी जाति से निकलकर जाटों में शामिल हो गये,यह सांसी जाति अपनी उत्पत्ति सांसमल नाम के भाटी राजपूत से मानती है,इनका वंश सांसी जाति से निकलकर जाटों में संधावालिया कहलाया.
इसी तरह पंजाब और हरियाणा का सैनी(शुद्ध सैनी न कि माली) समुदाय भी मूल रूप से मथुरा का यदुवंशी है ))

((इसी प्रकार मुस्लिम मेव जाति में भी यदुवंश पाया जाता है।
भारत में शुद्ध क्षत्रिय राजपूत यदुवंशियों की प्रमुख रियासते करौली,जैसलमेर,कच्छ,भुज राजकोट, जामनगर,सिरमौर,मैसूर आदि हैं.
दक्षिण का विजयनगर साम्राज्य, होयसल,देवगिरी आदि भी यदुवंशियो के बड़े राज्य थे।
पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में भी बड़े बड़े भाटी मुस्लिम राजपूत जमीदार हैं,सिंध में सम्मा,भुट्टो,भुट्टा भी यदुवंशी राजपूत हैं।...
उत्तर पश्चिम भारत के अतिरिक्त महाराष्ट्र में भी मराठा क्षत्रियो में जाधव वंश(यदुवंशी) पाया जाता है.छत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई भी यदुवंशी क्षत्राणी थी,दक्षिण की अर्यासु जाति और राजू जाति में भी यदुवंश मिलता है।))

हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षत्रिय बन्धु अक्सर यदुवंशी राजपूत शब्द पर भ्रमित हो जाते हैं क्योंकि उस इलाके में यदुवंशी राजपूत न के बराबर हैं
और वो अक्सर अहीर ग्वालों को ही यदुवंशी समझते हैं,

((दरअसल श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंशी क्षत्रियों में हुआ था,परिस्थितिवश उनका लालन पालन गोकुल में आभीर ग्वालों के बीच हुआ था,जबकि उन ग्वालो का यदुवंश से कोई सम्बन्ध नही था।))

((श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मणी से प्रधुम्न हुए,प्रधुम्न के अनिरुद्ध और अनिरुद्ध के वज्रनाभ हुए जिनका पांडवो द्वारा इंद्रप्रस्थ की गद्दी पर राज्याभिषेक किया गया,))

((आज के जादौन, भाटी, जाड़ेजा, चुडासमा, सरवैया, रायजादा,सलारिया, छोकर, जाधव राजपूत ही श्रीकृष्ण के वास्तविक वंशज हैं ।))

#जैसे यमुना का नाम अपभ्रंश होकर जमुना हो गया इसी तरह आम बोल चाल की भाषा में बृज के यदुवंशी पहले यादव से जादव फिर जादों और जादौन कहलाए जाने लगे,
जबकि भाटी जाड़ेजा आदि यदुवंशी शाखाएं नए वंशनाम से प्रसिद्ध हो गयी,

((इसका लाभ उठाकर सन् 1915 में ब्रिटिश काल में अहीर,गोप, ग्वाला, अहर ,कमरिया, घोसी जैसी अलग अलग जातियों ने मिलकर एक संस्था बनाई और मिलकर खुद को यादव घोषित कर दिया ,जबकि उससे पहले किसी रिकॉर्ड अभिलेख में इन अलग अलग जातियो को कभी यादव नही कहा गया न ही ये खुद को यादव कहते थे,))

दरअसल आज जो यादव जाति कहलाई जाती है वो कम से कम एक दस बारह अलग अलग जातियों का एक समूह है जिसने महज सौ वर्ष पहले खुद को यादव घोषित कर दिया और एकता के बल पर राजनैतिक ताकत हासिल करके एक झूठ को सत्य के रूप में प्रचारित कर दिया।।
((आज भी इन नकली यादवो की अलग अलग जातियो में आपस में विवाह सम्बन्ध नही होते,सिर्फ राजनैतिक ताकत के लिए ये एकजुट हैं।))

((सिर्फ हरियाणा रेवाड़ी के अहीर यदुवंशी कहे जा सकते हैं क्योंकि ये खुद को यदुवंशी राजपूतो से अंतर्जातीय विवाह सम्बन्धो द्वारा अहीरों में जाना बताते थे अब ताकतवर होकर वो भी मुकरने लगे हैं ))

कुछ और तथ्य----------
1---हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भी यदुवंशी राजपूत हैं

2---परमवीर चक्र विजेता स्वर्गीय मेजर शैतान सिंह भाटी और परमवीर चक्र विजेता स्वर्गीय गुरुबचन सिंह सलारिया यदुवंशी राजपूत थे।।
विश्व युद्ध में विक्टोरिया क्रॉस जीतने वाले नामदेव जाधव भी यदुवंशी मराठा राजपूत थे ��

3--पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल राहील शरीफ भी यदुवंशी भाटी राजपूत थे।

4--छत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई भी यदुवंशी मराठा राजपूत थी

5--ओलम्पिक में भारत की ओर से पहला व्यक्तिगत पदक जितने वाले पहलवान केडी जादव भी मराठा राजपूत थे,

6--शेरे पंजाब पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह भी यदुवंशी भाटी राजपूतो के वंशज थे,

7--भरतपुर के जाट राजा और पटियाला नाभा जींद कैथल फरीदकोट के जट्ट सिक्ख राजा भी खुद को आज भी यदुवंशी राजपूतो का वंशज मानते हैं जिनके पूर्वज जाट महिलाओ से शादी करके जाट बन गए थे।।

#कितनी_विडम्बना है कि आज असली यदुवंशियो को कोई नही जानता और फर्जी यदुवंशी सारे देश में सिर्फ सौ सालो के भीतर छदम पहचान से छा गए हैं।

पर सच क्या है और झूठ क्या है ये सबके सामने आना चाहिए।
सभी यदुवंशी क्षत्रियों राजपूतो मराठों से विनती है कि अपने नाम के आगे शाखा के साथ साथ यदुवंशी जरुर लिखें।
#सिंह_गमन_तत्पुरूष_वचन_कदली_फले_इक_बार।
#त्रिया_तेल_हम्मीर_हठ_चढ़े_न_दूजी_बार ॥

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