04/03/2018
पता नहीं क्यूँ........ आज तिरंगे में श्रीदेवी के शव को देखकर.......... अच्छा नहीं लगा.....
तिरंगे में लिपट कर जहाँ से विदा होना एक फ़ख्र की बात लगती थी............
लेकिन अब तो ऐसा लगता है........
जैसे कोई महत्व ही नही है तिरंगे का..
फौजी जो देश लिए लड़ते हुए अपनी जान देते हैं.............. उनके लिए तिरंगे में लिपटना एक फ़ख्र की बात होती है.......
आज तिरंगे में श्रीदेवी गयी.......
कल कोई और होगा....... फिर कोई और.........
अब तो लगता है कि तिरंगे की औकात एक कफ़न की हो गई है........ मैं दुखी हूँ....
बहुत ही ज्यादा दुखी हूँ........ बिल्कुल ही अच्छा नहीं लग रहा.......
अगर पद्मश्री होने का यह सम्मान है...
तो फिर गुलशन ग्रोवर भी तिरंगे में जायेगा.......... सैफ़ अली खान......
हे भगवान........ सोच भी नहीं सकता........ फिल्मी दुनिया में तो आधे लोग पद्मश्री हैं.......... पता नहीं, कौन यह फैसला करता है..
की किसका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ हो.........
और तिरंगे में उनका शव लपेटा जाये.. आज तिरंगे की बदहाली और बदनसीबी पर रोना आया...........
*अगर आप को भी ऐसा महसूस हुआ हो तो एक आवाज़ उठाएं की केवल शहीदों को ही यह सम्मान मिले......
जो दूसरों की और देश की हिफाज़त के लिये अपनी जान कुर्बान करते हैं, न कि केवल अपने लिए जीने और सुख सुविधाएं लूटने वालों के लिए....* अगर सहमत हों तो इस संदेश को आगे बढ़ाएं