" जिस देश में अपूज्य पूजे जाते हैं,और पूज्यों का निरादर होता है, उस देश की अधोगति निश्चित है।।"
महर्षि दयानन्द सरस्वती
Rajgunge Dayanand Saraswati Hindi Vidyalaya
A pvt. School Estd:-1990. Aimed to make education available for labour class society of National Jut Completely Raged by blaze on the night of 17/18 Aug 2011.
Operating as usual

संसार में तन मन धन से सुखी कौन नहीं रहना चाहता? सभी चाहते हैं।
परंतु यह बात भी प्रसिद्ध है, कि "कर्म किए बिना फल नहीं मिलता।" "इसलिए जो लोग सुखी रहना चाहते हैं, उन्हें कुछ न कुछ कर्म तो करना ही पड़ेगा, तभी उनकी इच्छा पूरी हो पाएगी।"
"तो यदि आप तन से सुखी रहना चाहते हों, तो व्यायाम करें। मन से सुखी रहना चाहते हों, तो ईश्वर का ध्यान करें। और यदि धन से सुखी रहना चाहते हों, तो अपनी आवश्यक मात्रा में धन का संग्रह अवश्य करें। अपने जीवन भर की आवश्यकताओं का हिसाब लगाएं। उसके हिसाब से धन की गणना करें और धीरे-धीरे उसे लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयत्न करें।"
"ग़लत तरीकों से धन कमा कर रातों-रात करोड़पति बनने की इच्छा न करें। वह दुखदायक सिद्ध होगी। इसलिए धीरे-धीरे धन कमाएं। ईमानदारी बुद्धिमत्ता और मेहनत से धन कमाएं. 50 55 वर्ष की उम्र तक धन कमाएं, और धीरे-धीरे अपने लक्ष्य तक पहुंच जाएं।"
"फिर यदि आप की आवश्यकता से अधिक धन आपके पास आ जावे, तो उस अधिक धन का दान अवश्य करें। योग्य पात्रों को दान देवेंं।" "वैदिक विद्वान संन्यासी ब्रह्मचारी परोपकारी आदि जो लोग ईश्वर के संविधान वेदों के अनुकूल उत्तम कर्म करते हों, अथवा जो लोग किसी परिस्थितिवश रोगी कमजोर विकलांग या आपत्ति में आ गए हों, उन्हें दान देकर ऐसे लोगों की सहायता अवश्य करें।"
"चाहे आपके पास थोड़ा धन भी हो, तब भी अपनी वार्षिक आय का 10 प्रतिशत धन तो दान अवश्य ही करें, और धीरे-धीरे भविष्य के लिए धन का संग्रह भी करते रहें।" वेदों में अपनी आय का 10 प्रतिशत दान देने का विधान है। यदि आप इतना नहीं करेंगे, तो आपके भविष्य की सुरक्षा नहीं हो पाएगी। "अर्थात आय के 10 प्रतिशत धन के दान से आपको पुण्य मिलेगा, और उससे आपका भविष्य सुखमय बनेगा।"
"यदि आप ऐसा करेंगे, तो आपका वर्तमान जीवन भी आनन्दमय होगा, आप स्वस्थ एवं दीर्घायु होंगे। तथा आप को अगले जन्म में भी इस धन के दान का अच्छा फल मिलेगा।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"


मन काला तन उजला बगुला कपटी अंग।
ता से तो कौआ भला तन मन एक ही रंग।।
~ कबीर साहिब

संसार में कहावत है कि "सत्य तो सदा कड़वा ही होता है." यह कहावत ठीक नहीं है।
महर्षि मनु जी ने वेदों के आधार पर ऐसा कहा है, कि "सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।। अर्थात सत्य बोलो, मीठा बोलो। परंतु कड़वा सत्य मत बोलो।" इसलिए वेदों और ऋषियों के ग्रंथों के अनुसार वास्तविकता यही है कि "सत्य मीठा भी होता है और कड़वा भी, दोनों प्रकार का होता है।"
यदि सत्य केवल कड़वा ही होता, तो हम सबके जीवन में सदा कड़वाहट ही बनी रहती। जबकि ऐसा नहीं है। इस विषय में यह प्रत्यक्ष प्रमाण भी है कि "आप पूरे दिन में अनेक बार सत्य बोलते हैं। जब आप दिन भर में अनेक बार सत्य बोलते हैं, फिर भी जीवन में कड़वाहट नहीं होती." तो इससे यह सिद्ध होता है, कि "सभी सत्य कड़वे नहीं होते। बहुत सारे सत्य मीठे भी होते हैं। उन मीठे सत्यों के कारण आपके जीवन में दिनभर मिठास बनी रहती है।"
हां, यह ठीक है, कि "कोई कोई सत्य ऐसा होता है, जिसे मीठा बनाकर भी बोला जा सकता है और कड़वा बनाकर भी।" जैसे कोई कहे, कि "सूरदास जी, ज़रा सावधानी से चलिएगा।" यह मीठा सत्य है। और कोई ऐसा भी कह सकता है, कि "अबे अंधे, तुझे दिखता नहीं है, मुझे चोट मार दी।" यह कड़वा सत्य है।
"परंतु कोई कोई सत्य तो ऐसा भी होता है, उसे आप जितना भी मीठा बनाएं, उसकी पूरी कड़वाहट नहीं जाती। कुछ तो कड़वाहट रहती ही है। विशेष रूप से उस सत्य की, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को उसका दोष बताता है।" "उस सत्य को आप कितना भी मीठा बनाएं, फिर भी दोष सुनने वाले को कुछ-न-कुछ कड़वाहट लगती ही है। थोड़ा तो कष्ट होता ही है। उसमें दोष सुनने वाले व्यक्ति का होता है, बोलने वाले का नहीं। क्योंकि वह सत्य को सुनना ही नहीं चाहता। यह दोष है। इस कारण से उसको वह सत्य मीठा होने पर भी हितकारी होने पर भी कड़वा लगता है।"
परंतु ऐसे सत्य भी यदा कदा बोलने ही पड़ते हैं। क्योंकि इसके बिना दूसरे व्यक्ति का सुधार होना संभव नहीं है। "जब तक दूसरे व्यक्ति का सुधार न हो, और यदि वह व्यक्ति आपका निकट संबंधी हो, तो उसका सुधार किए बिना आपके जीवन में सुख नहीं हो सकता। इसलिए ऐसे सत्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उसे कभी-न-कभी बोलना ही पड़ता है।"
जब जब ऐसा सत्य बोला जाता है, तब तब दूसरे लोगों को कष्ट होता है। "जिनका दोष बताया जाता है, तब वे उसकी प्रतिक्रिया करते हैं, रिएक्शन करते हैं। तब प्रतिक्रिया के रूप में यह झूठी कहावत बोली जाती है" कि "सत्य तो सदा कड़वा ही होता है।" अस्तु।
"अब जब भी आप उक्त कड़वा सत्य बोलेंगे, तब स्वाभाविक बात है, कि लोग आपके शत्रु बनेंगे। और आपसे घृणा भी करेंगे। आपके विरुद्ध अनेक प्रकार की कार्यवाही भी करेंगे। इस प्रकार से आप जितने अधिक लोगों को ऐसा कड़वा सत्य सुनाएंगे, आपके शत्रु भी उतने ही अधिक बनेंगे।" "फिर भी यथाशक्ति यथासंभव यथाअवसर बुद्धिमत्ता से आपको ऐसा सत्य बोलना ही चाहिए, क्योंकि इसके बिना आपका जीवन सुरक्षित एवं सुखमय नहीं बन पाएगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।"

जो व्यक्ति गंभीरता से विचार करता है वह जीवन में कुछ अच्छी बातें समझ लेता है। और यह भी समझ लेता है, कि "यदि मैं अच्छे काम करता रहूंगा, तो इसका अर्थ है, मैंने समय का पूरा पूरा लाभ लिया। मैंने अपनी जवानी का भी सही उपयोग किया। शुभ कर्म करने में अपनी जवानी खर्च की। इसका मुझे भविष्य में बहुत अच्छा फल मिलेगा।" "और अच्छे काम करते रहने से ही समाज में मेरा विश्वास और सम्मान भी बना रहेगा।"
जो कम बुद्धि वाले लोग हैं, वे इन बातों पर इतना ध्यान नहीं देते, और बहानेबाज़ी करते हैं, कि "थोड़ी बहुत गड़बड़ तो सभी लोग करते हैं, यदि मैं भी करूंगा, तो क्या फर्क पड़ेगा।" ऐसा सोच कर वे कभी-कभी गलतियां कर लेते हैं। परंतु वे लोग इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं करते, कि "यदि कभी पकड़े गए, तो समाज में उनका विश्वास और सम्मान खो जाएगा। एक बार यदि उनका विश्वास और सम्मान खो गया, तो फिर जीवन भर वैसा नहीं बनेगा, जैसा पहले था।"
परन्तु जब कोई थोड़ा बहुत बुद्धिमान और संस्कारी व्यक्ति गलत काम करते हुए पकड़ा जाता है, तब उसे पछतावा भी बहुत होता है, कि "मैंने ऐसा गलत काम क्यों किया? यदि मैं थोड़ा संयम रख लेता, तो इस काम को नहीं करता, और आज जो मेरा सम्मान और विश्वास खो गया है, यह नहीं खोता।" "यदि एक बार किसी का विश्वास और सम्मान खो जाए, तो केवल इतनी ही हानि नहीं होती, बल्कि भविष्य में समाज उस दोषी व्यक्ति को फिर वैसी सुविधाएं भी नहीं देता, जैसी कि पहले देता था।" यह भी हानि होती है।
"इसलिए सदा सावधानी और बुद्धिमत्ता से कार्य करें। कोई भी ग़लत काम करने से बचें। गलत काम करें ही नहीं, जिससे कि बाद में पछतावा न हो। अपना विश्वास और सम्मान समाज में बनाए रखें। समय और जवानी का पूरा लाभ उठाएं। इसी में जीवन की सफलता है।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

सच्चाई और अच्छाई की तलाश मे पूरी दुनिया ही क्यों ना घूम लो,
अगर वो खुद मे नहीं तो...कहीं भी नहीं।

अगर कोई तुमसे कहने आए कि फलां व्यक्ति बड़ा भोला है, तो एकदम से विश्वास करने की ज़रूरत नहीं है। भोलापन कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो सबको यूँ ही उपलब्ध हो जाए। भोलेपन का सम्बंध अहँकार के विलोप से है। मात्र संत ही भोले हैं। संत कौन? संत वह जो अस्ति मात्र से परिपूर्ण है, जो 'है' वही हो गया है, वह शुद्ध अस्तित्व हो गया है। अस्तित्व मात्र हो जाना, यह कोई साधारण सी बात तो नहीं है बल्कि यह एक दुर्लभ घटना है। इसे दुर्लभ घटना भी हमने ही बनाया हुआ है। भोलापन हमारा मूल स्वभाव है लेकिन हमारा मन कामनाओं के वशीभूत होकर अपने मूल स्वभाव से न जाने कितने कोसों दूर निकल जाता है। अब इतनी कामनाओं से भरे व्यक्ति के अंदर एक और कामना आ जाती है कि सब मुझे भोला माने क्योंकि अपनी नज़रों में मैं बहुत भोला हूँ। जो व्यक्ति अपनी ही नज़रों में भोला है वह बहुत चालाक (अहंकारी) है क्योंकि अहंकार की यही चाल रही है कि अपने मन को भोला बनाने में जो मेहनत करनी पड़ेगी, अहंकार पर जो चोट खानी पड़ेंगी, बना-बनाया ढाँचा टूटने का जो दर्द सहना पड़ेगा, तमाम प्रकार के भोगों से संबंध तोड़ना पड़ेगा, उससे तो अच्छा है कि स्वयं को भोला ही घोषित कर दो।
इस ही कारण आज मूर्ख भी स्वयं को भोला घोषित कर रहा है, चालाक भी स्वयं को भोला घोषित कर रहा है। भोगी भी भोला है, रोगी भी भोला है। अचानक से दुनिया में इतने भोले लोग आ गए हैं कि भोलेनाथ भी घबरा रहे हैं कि गजब का कंपटीशन बढ़ता जा रहा है। भोलेनाथ भी कह रहे हैं कि मुझे तो इतना कुछ साबित करने के बाद भोले की उपाधि मिली - ख़ुद ज़हर पीकर पहले सबके प्राणों की रक्षा की फिर अपने ही कंठ में ज़हर रोककर अपनी इच्छाशक्ति का संदेश दिया, इस शरीर में ही बैठी हुई विष के समान चीज़ों पर कैसे विजय प्राप्त करनी है, इसका उदाहरण प्रस्तुत किया। हमेशा ध्यानमग्न रहना पड़ता है, और भी पता नहीं क्या-क्या करना पड़ता है तब तो जाकर तुमने भोलेबाबा कहना शुरू किया लेकिन देखता हूँ कि आज तो चारों तरफ़ भोले ही भोले हैं। आज मैं भोले व्यक्ति को नहीं बल्कि ढूँढता हूँ ऐसे व्यक्ति को जो बोले कि मैं बहुत चालाक हूँ और इस-इस प्रकार की चालाकी मेरे अंदर है।
भोला वह है जो जानता सबकुछ है लेकिन उसके बाद भी उसने दुनिया की चालाकियों को न कह दिया है। भोला व्यक्ति बुद्धू नहीं है, वह परम ज्ञानी है और उसके जीवन में उस ही ज्ञान का तादात्म्य है।

ओ३म्
जीवन में समय समय पर समस्याएं आती रहती हैं, समस्त जीवन को समस्या रूप न समझें। संसार में आज तक कोई ऐसा ताला नहीं बना, जिसकी चाबी न हो। इसी प्रकार से जीवन में भी कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसका समाधान न हो। यह अलग बात है, कि ल़ोग उस समाधान को ढूँढने की कोशिश नहीं करते, उसे ढूँढ नहीं पाते, अथवा समाधान मिल जाने पर भी उसके अनुसार आचरण नहीं करते, या आचरण करना नहीं चाहते, हठ करते हैं, सत्य को स्वीकार नहीं करते। इन सब बातों के पीछे अविद्या, स्वार्थ, अभिमान आदि अनेक कारण होते हैं।
अस्तु ! जो भी समस्या हो, उस समस्या को पहचानें, उसका कारण खोजें और उस कारण को दूर करने का पूरा प्रयत्न करें। समस्याएँ हल हो सकती हैं। जीवन में यथासंभव आनन्द हो सकता है। और मनुष्य सारे दुखों से छूटकर मोक्ष तक भी पहुंच सकता है।

बुरा तब नहीं लगता जब हम बुरा होते हुए देखते हैं! बल्कि बुरा तो तब लगता है … जब उसके लिए हम कुछ कर ना पाएं!

क्या आप अपने जीवन में सफल होना चाहते हैं? यदि हां, तो इसके लिए आपको सबके साथ उत्तम व्यवहार करना होगा। "उत्तम व्यवहार करने के लिए आपको मनोविज्ञान का अध्ययन अवश्य ही करना होगा। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए खेती व्यापार इंजीनियरिंग डॉक्टरी कंप्यूटर चलाना रेल विमान चलाना इत्यादि अन्य भी अनेक कलाओं का ज्ञान होना आवश्यक है।" "परंतु इन सब कलाओं की जानकारी के साथ-साथ यदि आप मनोविज्ञान को नहीं जानते, तो इसके बिना आप जीवन में सफल नहीं हो सकते।"
क्योंकि मन का विज्ञान, एक ऐसा विज्ञान है, जिसको जानकर व्यक्ति सबके साथ अच्छा व्यवहार कर सकता है। सबको प्रसन्न कर सकता है। "खेती व्यापार इत्यादि अन्य कलाओं की सहायता से व्यक्ति धन तो कमा सकता है, परंतु केवल इन कलाओं को ध्यान लेने मात्र से वह दूसरों को प्रसन्न नहीं कर सकता। दूसरों को प्रसन्न किए बिना वह उनका प्रेम और सहयोग प्राप्त नहीं कर सकता। और इसके बिना जीवन अधूरा है।"
"दूसरे व्यक्ति के मन को प्रसन्न करना, यह एक बहुत बड़ी कला है। इसी कला से व्यक्ति दूसरों का प्रेम और सहयोग प्राप्त कर सकता है। और तभी उसे अपने उद्देश्य में या कार्यों में सफलता मिलती है, इसके बिना नहीं।"
"यदि आप किसी व्यक्ति के मन को प्रसन्न करने में सफल हो गए, तो वह तन मन धन से आपके सहयोग देगा।" "और मनोविज्ञान की ठीक जानकारी न होने से यदि आपने उसे नाराज कर दिया, तो वह आपको कुछ भी सहयोग नहीं देगा। बल्कि हो सकता है, कि वह आपका विरोधी भी बन जाए। तब आप जीवन में सफल नहीं हो पाएंगे।"
बच्चों का मनोविज्ञान अलग होता है। जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ती जाती है, मन बुद्धि का विकास होता जाता है, वैसे-वैसे उनकी रुचि क्रियाएं और प्रसन्नता के कारण भी बदलते रहते हैं। "जो व्यक्ति इस बात को नहीं जानता, वह बच्चे को युवा को प्रौढ़ को और वृद्ध को प्रसन्न नहीं कर पाएगा।" "इसलिए सभी आयु वर्ग के मनुष्यों का मन किस प्रकार से प्रसन्न होता है, उनकी किस आयु में क्या रुचि होती है, यह जानना आवश्यक है।" "उनको उनका मनपसंद व्यवहार यदि मिल जाए, तो वे निश्चित रूप से प्रसन्न हो सकते हैं। सबको प्रसन्न करने के लिए उनका मनोविज्ञान जानना आवश्यक है।"
परंतु किसी व्यक्ति के मन को आप तभी तो प्रसन्न कर पाएंगे, जब आप मन का विज्ञान जानते हों। "वेदों दर्शनों उपनिषदों आदि ऋषियों के सत्य ग्रंथों में जगह-जगह पर मनोविज्ञान की बातें लिखी हैं।" "अतः वेद आदि शास्त्रों को पढ़ें। वहां से सही मनोविज्ञान को समझें और उसके अनुसार ही अपने सारे व्यवहार करें। तभी आप सबको प्रसन्न करके अपने कार्यों में और अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर पाएंगे, अन्यथा नहीं।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़ गुजरात।"

कमियां तो, ईश्वर को छोड़कर सबमें हैं। परंतु लोगों की दृष्टि ऐसी है कि स्वयं में दिखती नहीं, और दूसरे व्यक्ति में कुछ अधिक ही दिखती हैं।
लेकिन मनोविज्ञान की बात यह है कि आप जैसा देखेंगे, सुनेंगे, कुछ दिनों में आप वैसे ही बनते जाएंगे। यदि आप दूसरों के दोष देखेंगे, तो वे दोष कुछ ही दिनों में आपके अंदर आ जाएंगे। यदि आप दूसरों के गुण देखेंगे, तो कुछ ही दिनों में वे गुण भी आपके अंदर आ जाएंगे। अब दोनों मार्ग आपके सामने हैं।
आप पढ़े-लिखे बुद्धिमान जन हैं। स्वयं विचार कीजिए कि किस मार्ग पर चलना आपके लिए हितकारी है!

बेग़ैरत हिन्दू अपने बच्चों को धर्म का परिचय नहीं दे पाता क्योंकि उसके माता-पिता ने भी उसे कुत्ते बिल्ली की तरह ही पाला था।
स्वाध्याय करना तो बहुत पहले ही छोड़ रखा था, अब अधर्मसापेक्षता ने पूरी तरह बण्टाढार कर दिया।
मनुर्भव
हिन्दू धर्म की कमजोरी क्या है ? By बहन अंजलि आर्या बहन अंजलि आर्या............................................................................................अगर वीडियो पसंद आए तो लाइक और शेयर कर प्रोत्साहित....

संसार में कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं है, सभी अल्पज्ञ हैं। इसलिए कोई भी व्यक्ति संपूर्ण ज्ञानी न होने के कारण अपने सारे काम स्वयं ठीक-ठीक नहीं कर पाता। उसे दूसरों से बहुत सा ज्ञान प्राप्त करना पड़ता है। इसीलिए आप भी अपने बच्चों को बचपन से ही स्कूल भेजते हैं, कि "जाओ, कुछ ज्ञान प्राप्त करो, जिससे कि आपका भावी जीवन सरल एवं सुखमय बने।"
केवल एक ईश्वर ही सर्वज्ञ है। उसका ज्ञान पूर्ण है, शुद्ध है, सर्वथा निर्दोष है। उसमें भ्रांति संशय आदि कोई भी दोष नहीं है। ऐसे सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान ईश्वर ने जब संसार बनाया, तब सभी लोग अज्ञानी थे। वे कुछ नहीं जानते थे। "तब सृष्टि के आरंभ काल में ईश्वर ने चार वेदों का ज्ञान मनुष्यों को दिया। और आरंभ के मनुष्यों अर्थात ऋषियों ने ईश्वर से चार वेदों का ज्ञान प्राप्त करके अन्य मनुष्यों को वेदों का ज्ञान दिया। और वही गुरु शिष्य परंपरा तब से आज तक चली आ रही है।"
"वेदों का शुद्ध ज्ञान प्राप्त करके और संसार में परिश्रम पुरुषार्थ कर करके कुछ लोग ऊंचे तत्त्वज्ञानी हो गए। वे संन्यासी बन गए, और संसार में घूम-घूम कर वेदों का प्रचार करने लगे।" "उनमें से कुछ गिने चुने लोग आज भी मिलते हैं, जो तपस्या करते हैं, वेदों के सच्चे विद्वान हैं और वे भी देश दुनियां में घूम घूमकर सबको वेदों का शुद्ध ज्ञान बांटते रहते हैं।"
"ऐसे वेदों के विद्वान उत्तम आचरण वाले सच्चे संन्यासी लोग जहां भी जाते हैं, वहां पर दीपक के समान वेदों के शुद्ध ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। ऐसे विद्वानों का सत्संग प्राप्त करना बहुत ही सौभाग्य की बात होती है।"
"यदि कभी आपके गांव नगर में या आपके आसपास ऐसे वेदों के विद्वान संन्यासी लोग पधारें, तो उनका सत्संग अवश्य करें। अथवा कभी कभी आप उनके आश्रमों गुरुकुलों आदि स्थानों पर जाकर उनसे शुद्ध ज्ञान का लाभ अवश्य प्राप्त करें।"
क्योंकि संसार में सभी लोग शुद्ध ज्ञानी एवं पूर्ण सत्यवादी नहीं होते। सबके पास वेदों का शुद्ध ज्ञान नहीं होता। "अनेक गुरुओं के पास शुद्ध अशुद्ध मिश्रित ज्ञान होता है। क्योंकि वे वेदों को ठीक ढंग से नहीं पढ़ते, उनको नहीं समझते, और उन पर सही ढंग से आचरण भी नहीं करते। इसलिए सभी विद्वान प्रवक्ता लोग उतने लाभकारी नहीं होते, जितने कि वेदों के सच्चे विद्वान वैराग्यवान एवं उत्तम आचरण वाले संन्यासी लोग।"
"अतः ऐसे वैदिक विद्वान संन्यासी वैरागी लोगों का सत्संग अवश्य करें और अपने जीवन को सफल बनाएं।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"

संसार में तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं-
1. उत्तम अर्थात् जो मधुमक्खी की भाँति सदैव मधुररस व सुगन्ध अर्थात् गुणों को ही ग्रहण करते हैं।
2. मध्यम अर्थात् जो मक्खी की भाँति दूषित व मधुर दोनों ही पदार्थों अर्थात् गुण व अवगुण दोनों का ग्रहण कर सकते हैं।
3. अधम अर्थात् जो गन्दगी के कीड़े की भाँति केवल दुर्गन्ध अर्थात् अवगुणों का ही ग्रहण करते हैं तथा किसी भी सत्संगति से उन पर कोई सुप्रभाव नहीं पड़ता।
- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

आप नेक कार्य निरंतर करते रहें, कोई आपका सम्मान करे या न करे, आपकी अंतरात्मा सदा आपको सम्मानित करेगी।
इससे बड़ा सुख जीवन में और कुछ भी नही है।
रास्ता धुंधला हो सकता है लेकिन मंजिल नहीं!
दौर बुरा हो सकता है लेकिन जिंदगी नहीं!!

हम आर्यवर्त संस्कृति में पले-बढ़े हैं।
हमारा नाम आर्य है। हमारी खोई पहचान वैदिक धर्म को स्थापित करना हमारा कर्तव्य है।

कुछ लोग केवल सफल होने के सपने देखते हैं … जबकि अन्य लोग इसके लिए कठिन परिश्रम करते हैं।

संसार में बहुत से गुण हैं, और बहुत से दोष भी हैं। उन दोषों में से एक दोष है, जिसे "ईर्ष्या द्वेष" कहते हैं। "जब कोई व्यक्ति पुरुषार्थ करता है, तो उसकी उन्नति होती है। यह उसके कर्म का फल है।" ईश्वर का नियम है "जो व्यक्ति कर्म करेगा, उसको फल अवश्य मिलेगा।"
परन्तु कुछ दूसरे लोग उसकी उन्नति को देखकर जलते हैं, और उसके काम में बाधाएं डालते हैं। "ऐसे लोग मूर्ख दुष्ट एवं आलसी होते हैं। वे स्वयं तो कुछ करते नहीं और दूसरों की उन्नति देखकर जलन के कारण उनका काम भी अटकाते हैं। उन्हें ठीक ढंग से काम करने नहीं देते। ऐसे दुष्टों को अवश्य ही दंड मिलना चाहिए।" "ईश्वर न्यायकारी है। वह तो समय आने पर दंड देगा ही। परन्तु समाज के बुद्धिमान लोगों को भी इस दिशा में कुछ प्रयत्न अवश्य करना चाहिए, जिससे लोगों का जीवन आसान हो जाए।"
आपके सामने भी यह समस्या आती होगी। "कुछ लोग आपकी उन्नति को देखकर जलते होंगे, और वे भी आपके काम में बाधाएं डालते होंगे।" "जब ऐसा हो, तब आप घबराएं नहीं। उन बाधाओं को दूर करने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करें। बल्कि पहले से सावधान रहें, कि "कब कहां से कौन सी बाधा आ सकती है?" उसका समाधान पहले से तैयार रखें।" "जब वह बाधा उपस्थित हो, तो तत्काल ही, पहले से सोचे हुए उस समाधान का प्रयोग करें। इससे आपकी बहुत सी समस्याएं हल हो जाएंगी, और आप बहुत कुछ सुखपूर्वक जी सकेंगे।"
यह कितने आश्चर्य की बात है, कि "संसार में लोग जीवित मनुष्यों के काम में ही बाधाएं डालते हैं।" "क्योंकि मृत व्यक्तियों को तो क्या परेशान कर पाएंगे, वे तो अब रहे नहीं। और जिनकी मृत्यु हो गई, परन्तु अभी उनका अंतिम संस्कार नहीं हुआ। यदि उनकी शवयात्रा जा रही हो, तो उन्हें उस शव (Dead body) से भी डर लगता है। इसलिए उसका रास्ता भी तत्काल छोड़ देते हैं। बाकी बचे जीवित मनुष्य। उन्हीं को संसार के लोग ईर्ष्या द्वेष के कारण परेशान करते हैं।"
"अतः ऐसी स्थिति में आप भी पहले से तैयार रहें, घबराएं नहीं, और बाधाओं से युद्ध करके उन्हें जीतें। तभी आप कुछ ठीक-ठाक ढंग से जीवन जी पाएंगे।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"

पण्डित कौन होता है?
जो सदा धर्मयुक्त कर्मों को करने में प्रशस्त रहता हो, अधार्मिक कृत्य कभी न करता हो, न ही कभी भी ईश्वर, वेद और धर्म का विरोधी हो, परमात्मा और सत्यविद्या (वेद) और धर्म में दृढ विश्वासी हो । वही मनुष्य “पण्डित” के लक्षणयुक्त होता है।
-महर्षि दयानंद सरस्वती पुस्तक - व्यवहारभानु

वेदों में नारी का महत्व
स्त्रियों की शिक्षा- दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का जो सुन्दर वर्णन पाया जाता है, वैसा संसार के अन्य किसी धर्मग्रंथ में नहीं है| वेद उन्हें घर की सम्राज्ञी कहते हैं और देश की शासक, पृथ्वी की सम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते हैं|
वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय| वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख – समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा- जो सबको जगाती है इत्यादि अनेक आदर सूचक नाम दिए गए हैं|
वेदों में स्त्रियों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है – उसे सदा विजयिनी कहा गया है और उन के हर काम में सहयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है| वैदिक काल में नारी अध्यन- अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र में भी जाती थी| जैसे कैकयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध में गई थी| कन्या को अपना पति स्वयं चुनने का अधिकार देकर वेद पुरुष से एक कदम आगे ही रखते हैं|
अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं – अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि |
तथापि, जिन्होनें वेदों के दर्शन भी नहीं किए, ऐसे कुछ रीढ़ की हड्डी विहीन बुद्धिवादियों ने इस देश की सभ्यता, संस्कृति को नष्ट – भ्रष्ट करने का जो अभियान चला रखा है – उसके तहत वेदों में नारी की अवमानना का ढ़ोल पीटते रहते हैं |
आइए, वेदों में नारी के स्वरुप की झलक इन मंत्रों में देखें -
यजुर्वेद २०.९
स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है |
यजुर्वेद १७.४५
स्त्रियों की भी सेना हो | स्त्रियों को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें |
यजुर्वेद १०.२६
शासकों की स्त्रियां अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें | जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों |
अथर्ववेद ११.५.१८
ब्रह्मचर्य सूक्त के इस मंत्र में कन्याओं के लिए भी ब्रह्मचर्य और विद्या ग्रहण करने के बाद ही विवाह करने के लिए कहा गया है | यह सूक्त लड़कों के समान ही कन्याओं की शिक्षा को भी विशेष महत्त्व देता है |
कन्याएं ब्रह्मचर्य के सेवन से पूर्ण विदुषी और युवती होकर ही विवाह करें |
अथर्ववेद १४.१.६
माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धीमत्ता और विद्याबल का उपहार दें | वे उसे ज्ञान का दहेज़ दें |
जब कन्याएं बाहरी उपकरणों को छोड़ कर, भीतरी विद्या बल से चैतन्य स्वभाव और पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने वाली और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने – कराने वाली हो तब सुयोग्य पति से विवाह करे |
अथर्ववेद १४.१.२०
हे पत्नी ! हमें ज्ञान का उपदेश कर |
वधू अपनी विद्वत्ता और शुभ गुणों से पति के घर में सब को प्रसन्न कर दे |
अथर्ववेद ७.४६.३
पति को संपत्ति कमाने के तरीके बता |
संतानों को पालने वाली, निश्चित ज्ञान वाली, सह्त्रों स्तुति वाली और चारों ओर प्रभाव डालने वाली स्त्री, तुम ऐश्वर्य पाती हो | हे सुयोग्य पति की पत्नी, अपने पति को संपत्ति के लिए आगे बढ़ाओ |
अथर्ववेद ७.४७.१
हे स्त्री ! तुम सभी कर्मों को जानती हो |
हे स्त्री ! तुम हमें ऐश्वर्य और समृद्धि दो |
अथर्ववेद ७.४७.२
तुम सब कुछ जानने वाली हमें धन – धान्य से समर्थ कर दो |
हे स्त्री ! तुम हमारे धन और समृद्धि को बढ़ाओ |
अथर्ववेद ७.४८.२
तुम हमें बुद्धि से धन दो |
विदुषी, सम्माननीय, विचारशील, प्रसन्नचित्त पत्नी संपत्ति की रक्षा और वृद्धि करती है और घर में सुख़ लाती है |
अथर्ववेद १४.१.६४
हे स्त्री ! तुम हमारे घर की प्रत्येक दिशा में ब्रह्म अर्थात् वैदिक ज्ञान का प्रयोग करो |
हे वधू ! विद्वानों के घर में पहुंच कर कल्याणकारिणी और सुखदायिनी होकर तुम विराजमान हो |
अथर्ववेद २.३६.५
हे वधू ! तुम ऐश्वर्य की नौका पर चढ़ो और अपने पति को जो कि तुमने स्वयं पसंद किया है, संसार – सागर के पार पहुंचा दो |
हे वधू ! ऐश्वर्य कि अटूट नाव पर चढ़ और अपने पति को सफ़लता के तट पर ले चल |
अथर्ववेद १.१४.३
हे वर ! यह वधू तुम्हारे कुल की रक्षा करने वाली है |
हे वर ! यह कन्या तुम्हारे कुल की रक्षा करने वाली है | यह बहुत काल तक तुम्हारे घर में निवास करे और बुद्धिमत्ता के बीज बोये |
अथर्ववेद २.३६.३
यह वधू पति के घर जा कर रानी बने और वहां प्रकाशित हो |
अथर्ववेद ११.१.१७
ये स्त्रियां शुद्ध, पवित्र और यज्ञीय ( यज्ञ समान पूजनीय ) हैं, ये प्रजा, पशु और अन्न देतीं हैं |
यह स्त्रियां शुद्ध स्वभाव वाली, पवित्र आचरण वाली, पूजनीय, सेवा योग्य, शुभ चरित्र वाली और विद्वत्तापूर्ण हैं | यह समाज को प्रजा, पशु और सुख़ पहुँचाती हैं |
अथर्ववेद १२.१.२५
हे मातृभूमि ! कन्याओं में जो तेज होता है, वह हमें दो |
स्त्रियों में जो सेवनीय ऐश्वर्य और कांति है, हे भूमि ! उस के साथ हमें भी मिला |
अथर्ववेद १२.२.३१
स्त्रियां कभी दुख से रोयें नहीं, इन्हें निरोग रखा जाए और रत्न, आभूषण इत्यादि पहनने को दिए जाएं |
अथर्ववेद १४.१.२०
हे वधू ! तुम पति के घर में जा कर गृहपत्नी और सब को वश में रखने वाली बनों |
अथर्ववेद १४.१.५०
हे पत्नी ! अपने सौभाग्य के लिए मैं तेरा हाथ पकड़ता हूं |
अथर्ववेद १४.२ .२६
हे वधू ! तुम कल्याण करने वाली हो और घरों को उद्देश्य तक पहुंचाने वाली हो |
अथर्ववेद १४.२.७१
हे पत्नी ! मैं ज्ञानवान हूं तू भी ज्ञानवती है, मैं सामवेद हूं तो तू ऋग्वेद है |
अथर्ववेद १४.२.७४
यह वधू विराट अर्थात् चमकने वाली है, इस ने सब को जीत लिया है |
यह वधू बड़े ऐश्वर्य वाली और पुरुषार्थिनी हो |
अथर्ववेद ७.३८.४ और १२.३.५२
सभा और समिति में जा कर स्त्रियां भाग लें और अपने विचार प्रकट करें |
ऋग्वेद १०.८५.७
माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धिमत्ता और विद्याबल उपहार में दें | माता- पिता को चाहिए कि वे अपनी कन्या को दहेज़ भी दें तो वह ज्ञान का दहेज़ हो |
ऋग्वेद ३.३१.१
पुत्रों की ही भांति पुत्री भी अपने पिता की संपत्ति में समान रूप से उत्तराधिकारी है |
ऋग्वेद १० .१ .५९
एक गृहपत्नी प्रात : काल उठते ही अपने उद् गार कहती है -
” यह सूर्य उदय हुआ है, इस के साथ ही मेरा सौभाग्य भी ऊँचा चढ़ निकला है | मैं अपने घर और समाज की ध्वजा हूं , उस की मस्तक हूं | मैं भारी व्यख्यात्री हूं | मेरे पुत्र शत्रु -विजयी हैं | मेरी पुत्री संसार में चमकती है | मैं स्वयं दुश्मनों को जीतने वाली हूं | मेरे पति का असीम यश है | मैंने वह त्याग किया है जिससे इन्द्र (सम्राट ) विजय पता है | मुझेभी विजय मिली है | मैंने अपने शत्रु नि:शेष कर दिए हैं | ”
वह सूर्य ऊपर आ गया है और मेरा सौभाग्य भी ऊँचा हो गया है | मैं जानती हूं , अपने प्रतिस्पर्धियों को जीतकर मैंने पति के प्रेम को फ़िर से पा लिया है |
मैं प्रतीक हूं , मैं शिर हूं , मैं सबसे प्रमुख हूं और अब मैं कहती हूं कि मेरी इच्छा के अनुसार ही मेरा पति आचरण करे | प्रतिस्पर्धी मेरा कोई नहीं है |
मेरे पुत्र मेरे शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं , मेरी पुत्री रानी है , मैं विजयशील हूं | मेरे और मेरे पति के प्रेम की व्यापक प्रसिद्धि है |
ओ प्रबुद्ध ! मैंने उस अर्ध्य को अर्पण किया है , जो सबसे अधिक उदाहरणीय है और इस तरह मैं सबसे अधिक प्रसिद्ध और सामर्थ्यवान हो गई हूं | मैंने स्वयं को अपने प्रतिस्पर्धियों से मुक्त कर लिया है |
मैं प्रतिस्पर्धियों से मुक्त हो कर, अब प्रतिस्पर्धियों की विध्वंसक हूं और विजेता हूं | मैंने दूसरों का वैभव ऐसे हर लिया है जैसे की वह न टिक पाने वाले कमजोर बांध हों | मैंने मेरे प्रतिस्पर्धियों पर विजय प्राप्त कर ली है | जिससे मैं इस नायक और उस की प्रजा पर यथेष्ट शासन चला सकती हूं |
इस मंत्र की ऋषिका और देवता दोनों हो शची हैं | शची इन्द्राणी है, शची स्वयं में राज्य की सम्राज्ञी है ( जैसे कि कोई महिला प्रधानमंत्री या राष्ट्राध्यक्ष हो ) | उस के पुत्र – पुत्री भी राज्य के लिए समर्पित हैं |
ऋग्वेद १.१६४.४१
ऐसे निर्मल मन वाली स्त्री जिसका मन एक पारदर्शी स्फटिक जैसे परिशुद्ध जल की तरह हो वह एक वेद, दो वेद या चार वेद , आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद , अर्थवेद इत्यादि के साथ ही छ : वेदांगों – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद : को प्राप्त करे और इस वैविध्यपूर्ण ज्ञान को अन्यों को भी दे |
हे स्त्री पुरुषों ! जो एक वेद का अभ्यास करने वाली वा दो वेद जिसने अभ्यास किए वा चार वेदों की पढ़ने वाली वा चार वेद और चार उपवेदों की शिक्षा से युक्त वा चार वेद, चार उपवेद और व्याकरण आदि शिक्षा युक्त, अतिशय कर के विद्याओं में प्रसिद्ध होती और असंख्यात अक्षरों वाली होती हुई सब से उत्तम, आकाश के समान व्याप्त निश्चल परमात्मा के निमित्त प्रयत्न करती है और गौ स्वर्ण युक्त विदुषी स्त्रियों को शब्द कराती अर्थात् जल के समान निर्मल वचनों को छांटती अर्थात् अविद्यादी दोषों को अलग करती हुई वह संसार के लिए अत्यंत सुख करने वाली होती है |
ऋग्वेद १०.८५.४६
स्त्री को परिवार और पत्नी की महत्वपूर्ण भूमिका में चित्रित किया गया है | इसी तरह, वेद स्त्री की सामाजिक, प्रशासकीय और राष्ट्र की सम्राज्ञी के रूप का वर्णन भी करते हैं |
ऋग्वेद के कई सूक्त उषा का देवता के रूप में वर्णन करते हैं और इस उषा को एक आदर्श स्त्री के रूप में माना गया है | कृपया पं श्रीपाद दामोदर सातवलेकर द्वारा लिखित ” उषा देवता “, ऋग्वेद का सुबोध भाष्य देखें |
सारांश (पृ १२१ – १४७ ) -
१. स्त्रियां वीर हों | ( पृ १२२, १२८)
२. स्त्रियां सुविज्ञ हों | ( पृ १२२)
३. स्त्रियां यशस्वी हों | (पृ १२३)
४. स्त्रियां रथ पर सवारी करें | ( पृ १२३)
५. स्त्रियां विदुषी हों | ( पृ १२३)
६. स्त्रियां संपदा शाली और धनाढ्य हों | ( पृ १२५)
७.स्त्रियां बुद्धिमती और ज्ञानवती हों | ( पृ १२६)
८. स्त्रियां परिवार ,समाज की रक्षक हों और सेना में जाएं | (पृ १३४, १३६ )
९. स्त्रियां तेजोमयी हों | ( पृ १३७)
१०.स्त्रियां धन-धान्य और वैभव देने वाली हों | ( पृ १४१-१४६)
#कृष्णप्रिया

"संसार में कोई भी व्यक्ति लगातार 100 % सुखी नहीं हो सकता, और 100 % दुखों से नहीं छूट सकता। यह जीवन का सत्य है।"
ऐसा क्यों है? "क्योंकि आत्मा का जिस प्रकृति या भौतिक संसार के साथ संबंध है, वह प्रकृति 100 % सुख नहीं देती। उसमें यह क्षमता ही नहीं है। बल्कि थोड़ा सा सुख देने के साथ-साथ वह बहुत सा दुख भी देती है। उसका स्वरूप ही ऐसा है।"
अब आत्मा की इच्छा इससे अलग है। आत्मा की दो इच्छाएं हैं। "वह 100 % सुख प्राप्त करना चाहता है, और 100 % दुखों से छूटना चाहता है। परंतु वह अपना संबंध बनाए बैठा है इस दुखदायक प्रकृति के साथ। इसलिए उसकी ये दोनों इच्छाएं संसार में जीते जी तो पूरी नहीं हो सकती।"
हां, "यदि आत्मा इस भौतिक संसार या प्रकृति से अपना संबंध पूरी तरह से तोड़कर इससे अलग हो जाए, और सर्वगुण संपन्न 100 % आनन्दस्वरूप परमात्मा के साथ अपना संबंध जोड़ ले, तब उसकी ऊपर बताई गई ये दोनों इच्छाएं पूरी हो सकती हैं।" और ऐसा केवल मोक्ष में ही संभव है। "इसलिए सभी लोगों को मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य बनाना चाहिए और उसके लिए पूरा प्रयत्न करना चाहिए।"
परंतु जब तक आप संसार में जीवित हैं, और अपने कार्य कर रहे हैं, तो यहां की स्थिति के अनुसार जीवन में कभी अच्छे दिन भी आएंगे, जब आपको सुख मिलेगा। और कभी कभी बुरे दिन भी आएंगे, जब आपको दुख भी भोगने पड़ेंगे। कोई बात नहीं, "जब तक आप संसार में हैं, तब तक कोई न कोई ढंग तो निकालना ही होगा, जिससे कि आप कम से कम दुखी हों, और अधिक से अधिक सुखी रहें।"
तो इसका उपाय यही है, कि "जिन दिनों में आपको सुख मिले, उन दिनों में "अभिमान मत कीजिएगा।" क्योंकि अभिमान करने से व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है, और वह उल्टे काम करने लगता है, जिससे उसका दुख बढ़ता है।"
"और जब बुरे दिन आएं, अर्थात जिन दिनों में आपको दुख भोगने पड़ें, तब "धैर्य को मत खो दीजिएगा।" क्योंकि धैर्य को खो देने से व्यक्ति अनेक प्रकार से विचलित हो जाता है, और वह दुखों का सामना नहीं कर पाता, घबरा जाता है। अनेक बार तो आत्महत्या तक भी कर लेता है।"
"इसलिए ऐसी सभी समस्याओं से बचने के लिए "दुख के दिनों में धैर्य को अवश्य ही बनाए रखें।" यदि आप धैर्य बनाए रखेंगे, तो धीरे-धीरे सब समस्याएं हल हो जाएंगी, और आपको जीवन में फिर से सुख प्राप्त हो सकेगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।"

विचार, व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्धारण करते हैं।
विचार सरल हो सकते हैं, उदार हो सकते हैं, तटस्थ हो सकते हैं, संकीर्ण हो सकते हैं। विचारों में परिवर्तन भी होता रहता है परंतु जिनके विचार संकीर्ण हों उनमें परिवर्तन के दर्शन होना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। कई बार तो संकीर्ण विचारों वाले व्यक्ति में परिवर्तन के प्रयास उसके विचारों को और अधिक संकुचित कर देते हैं।

#रोमिला_थापर जी अपनी इतिहास की पुस्तक #भारत_का_इतिहास नामक पुस्तक की पेज नम्बर 31, 32 पर लिखती है
कि
#आर्य भारत में अर्ध-विचरण पशुचारी के रूप में आये थे।
फिर लिखते हैं कि #वैदिक राजा मुख्यतः #सैनिक नेता होता था।
प्रश्न यह है
कि
ऐसी #जानकारी लेखिका रोमिला थापर जी को किस पुरातात्विक अभिलेख से हुई?
वह पुरातात्विक अभिलेख किस लिपि भाषा में लिखा हुआ था?
इसकी पूरी जानकारी विस्तार से देना चाहिए था?
क्या है कि किसी देश का इतिहास कथा-कहानी या साहित्य नही होता है,
देस का इतिहास लिखने के लिए पुरातात्विक प्रमाण की आवश्यकता होती है।
उसमें भी पुरातात्विक प्रमाण में पठनीय अभिलेख की बहुत ज्यादा जरूरत होती है।
वैसी परिस्थिति में रोमिला थापर जी या आर्य अनुयाई को बताना चाहिए कि वह पठनीय अभिलेख कहाँ और किस लिपि में है?

यदि हममें इतना विवेक और विचार आ जाए कि मेरा धन कोई चुरा ले तो मुझे कष्ट होगा, अतः मुझे भी किसी का धन नहीं चुराना है। मेरे साथ कोई छल-षड़यंत्र करे तो मुझे बुरा लगेगा, अतः मैं भी किसी के साथ छल-षड़यंत्र न करूं। मुझे कोई सताए तो मुझे दुःख होगा, अतः मैं भी किसी को नहीं सताऊं। मेरी कोई हंसी उड़ाये, उपहास करे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा, अतः मैं भी किसी की हंसी न उड़ाऊं, तो सारी समस्या ही समाप्त हो जाए। इसी का नाम मनुष्यत्व और मानवता है।
यदि प्रत्येक व्यक्ति इतना सीख जाए तो संसार में कोई झगड़ा ही न रहे। यही उत्तम कोटि का धर्म है। संसार की शानौशोकत और राग-रंग में सुख नहीं है; दुःख रहित, सम्पूर्ण और शाश्वत सुख धर्म में ही है। पाप से दुःख और धर्म से सुख होता है, यह भी तय है। यदि आप में इतना भी विवेक नहीं है तो आप में मानवता नहीं है। यदि इस प्रकार का विवेक और विचार आ जाए तो अनीति, हिंसा, असत्य, चोरी, दूसरों का धन छीनना, क्रोध अथवा अहंकार रहेगा ही नहीं। यह बात पूरी तरह पालन करने की भावना जिस दिन आप में आ जाएगी, समझिए सच्चे सुख का प्रारम्भ हो गया है।
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This institution is completely dedicated for the education of ruler girl child
Jagacha, Santragachi
Howrah, 711111
A co-educational Govt Sponsored school situated within South-Eastern Railway area at Santragachi, PO
Howrah
Co Educational Higher secondary school with Science,Commerce and Arts Stream. Gym, Judo &Smart class
109, Abhay Guha Road, Liluah
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<<A PLACE WHERE WE BECAME WHAT WE ARE TODAY>>
9, Biplabi Haren Ghosh Sarani (9, Church Road, India)
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This is the only government school in Howrah. Established on 1st December 1845. This is not the offi
9 CHURCH Road
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Howrah Zilla School is one of the most premier educational institutes in West Bengal, India. Establi